क्या परमात्मा को याद करना जरूरी है?

आप सब यह बात जानते हैं की हमारा यह क्षणिक जीवन अनेकों दृश्यों से भरा हुआ है, जिसमें से किसी समय में तो हम सुखी होते हैं , तो किसी समय हम दुख व अशांति से लड़ रहे होते हैं। 
जब हमारे जीवन में दुख आता है, तो अज्ञानवश हम उस परमेश्वर की ओर इशारा करके उसे उन परिस्तिथियों के लिए दोषारोपित करते हैं, और परमात्मा से पूछते हैं कि उन्होंने हमारे साथ ऐसा क्यों किया। 
मान लीजिये कि एक महिला, जिसने अभी थोड़े समय पहले  गर्भधारण किया है, दुर्भाग्यवश गर्भ में उसके बच्चे की मृत्यु हो जाती है, और मां अपने टूटे हुए सपनों और खुद को संभालती हुई और अपनी  शारीरिक व मानसिक पीड़ा से लड़ती हुई परमात्मा से पूछती है कि उन्होंने उसके साथ ऐसा क्यों किया। 
आपको क्या लगता है की ईश्वर ऐसा क्यों करेंगे ? और हम सभी को भी यह क्यों लगता है कि परमात्मा ऐसा कर सकते हैं? वह जिसे पूरी दुनिया पूजती है, जिसका गुणगान करती है, उस ईश्वर में कुछ तो है जो पूजनीय है।  उसमें ऐसे गुण है जो हम अपने लिए भी चाहते हैं, जैसे दया, प्रेम, शांति, प्रसन्नता इत्यादि।  अब सोचिये कि जिसमें दया भरी हुई है तो वह क्या किसी भी मां के साथ ऐसा कर सकता है? जब आप और हम जैसे साधारण से लोग भी ऐसा करने की सोच नहीं सकते हैं तो वह ईश्वर, परमात्मा, अल्लाह, भगवान, ऊपर वाला, जो चाहे बुला लीजिए, क्या हुआ ऐसा कर सकता है? आप सभी इस प्रश्न को सोचिये और स्वयं को उत्तर दीजिए। जहाँ तक मैं समझती हूं, आप में से 99% लोगों का जवाब "नहीं" होगा, तो फिर इस बात को जानकर हमे यह मानना पड़ेगा कि ईश्वर किसी के भी साथ गलत नहीं करता। 
आप पूछेंगे, तो फिर हमारे साथ इतना कुछ गलत कैसे हो जाता है? इसका उत्तर है, "हमारे संचित कर्म" हम इस शरीर से जितने भी कर्म कर रहे हैं, हर एक कर्म का एक परिणाम है। अच्छा, बुरा सब हमारी कमाई है. हम आज जो सुख या दुःख का अनुभव कर रहे हैं वह सब पूर्व मैं हमारे द्वारा किये गए कर्मो का परिणाम है। पूर्व का तात्पर्य सिर्फ इसी जन्म से नहीं अपितु पिछले जन्म मैं किये कर्मो से भी है. मृत्यु के बाद आत्मा सिर्फ अपने संचित कर्मो को अपने साँथ ले कर जाती है, और इसी के कारण हमें भिन्न-भिन्न प्रकार की सुख या दुःख की अवस्थाओं से गुजरना पढता है। 
अगर आप चाहते हैं कि आपको अपने जीवन में सब अच्छा मिले, तो कम से कम उस अनुसार कर्म कीजिए।  अच्छे कर्म का फल अच्छा और बुरे कर्म का फल बुरा होता है और यही प्रकृति का नियम है जिसे तोडा नहीं जा सकता। इस जनम मैं न सही पर अगले जन्म मैं तो फल मिलेगा ही. 
हमें क्या चाहिए यह सोचते हुए ही हमें कर्म को करना है।  तो यदि आप चाहते हैं कि आपको सब प्यार और सम्मान दे तो आपको भी प्यार व सम्मान ही सबको देना होगा।  इसका मतलब हम जो चाहते हैं, वह पाने के लिए हमें वही देना चाहिए। यदि मुझे पैसे चाहिए तो मुझे क्या देना है........? अगर मुझे विश्वास चाहिए तो मुझे क्या देना है........? अगर मुझे मदद चाहिए तो मुझे क्या देना है.........? आप सब ऊपर लिखे वाक्यों को स्वयं ही पूरा करें।  तो इन सब बातों से यह तो साफ है कि हमारे साथ जो होता है, जिसे हम अपनी किस्मत या भाग्य कहते हैं, वह हमारे ही  हाथ में है। 
तो फिर जब सब कुछ हमारे हाथ में तो फिर उस परमात्मा को याद करना क्यों है? उसको पूजना ही क्यों ?  क्यों याद रखना है? चलिए अब इसे भी समझने की कोशिश करते हैं। 
अच्छा फल और अच्छा भाग्य सुना जाना तो आसान है पर आप बताइए कि क्या अच्छा कर्म कर पाना आसान है ? क्या विपरीत परिस्थितियों में भी अच्छा कर्म कर पाना आसान है? मान लीजिये की किसी व्यक्ति ने हमें धोखा दिया या किसी प्रकार का दुख दिया तो क्या उसी स्थिति में हम उस व्यक्ति के लिए अच्छा सोच सकते हैं? और यह अच्छी सोच रखना कितना आसान होगा? जिस व्यक्ति के साथ हमारा अच्छा संबंध है उस व्यक्ति के लिए तो अच्छा सोचना और करना तो काफी सहज है परंतु हमें उन व्यक्तियों के साथ भी अच्छा करना चाहिए जिनके साथ हमारा उर्जा का आदान-प्रदान कम है क्योंकि उनके लिए भी किया गया कर्म भी हमारे खाते में जुड़ेगा। उसी मुश्किल समय में जब हम कमजोर पड़ जाते हैं और चाहते हुए भी उस व्यक्ति के लिए अच्छा नहीं सोच पाते हैं, उस समय हम आत्मिक रूप मैं कमजोर हैं, और तब हमें आवश्यकता होती है उस शक्ति की, उस ताकत की जो हमें मजबूत बनाएं ताकि हम इस कर्म सम्बन्धी ज्ञान को उस समय उपयोग में ला पाए। 
उस समय वही परम शक्तिमान, दया का सागर, परमात्मा उस ज्ञान का स्रोत बनता है और हमे सही कर्मा का चुनाव करने मैं हमारी मदद करता है। इसीलिए उससे जुड़ना ही हमारे लिए एकमात्र सुलभ रास्ता है और इसीलिए उस परमात्मा को याद करना हमारे लिए ज़रूरी है। 
आप जब उसकी याद में बैठते हैं और उससे जुड़ते हैं तो आपकी और उसकी ऊर्जा आपस में मिलती है।  ईश्वर उस सकारात्मक ऊर्जा का पावर हाउस है, वही उस ऊर्जा का भंडार है और जब हम उससे जुड़ते हैं, उसकी याद में बैठते हैं, तो उसकी ओर से ऊर्जा का प्रवाह स्वतः ही हमारी और होने लगता है। विज्ञान का साधारण नियम है की उर्जा हमेशा ज्यादा से कम की ओर बहती है।  इसका अनुभव आपने कभी ना कभी किसी देवालय में किया होगा जहां जाकर आपको शांति, सुख और आनंद की प्राप्ति हुई होगी. और अगर किसी ने अभी तक इस को अनुभव नहीं किया तो एक बार अवश्य प्रयोग करके देखें।  उससे मिली उर्जा ही हमें हमें इस अर्जित ज्ञान को उपयोग करने की शक्ति देती है। शक्ति ज्ञान से ज़्यादा उसके उपयोग में परिलक्षित होती है। अर्जित ज्ञान यदि कर्म में ही नहीं आये, तो उस ज्ञान को अर्जित करने का क्या लाभ!!!! उदाहरण के लिए, एक वैज्ञानिक चाहे कितना ही ज्ञानवान, विद्वान क्यों ना हो, यदि वह अपने ज्ञान का सही उपयोग नहीं कर पायेगा तो उसके उस ज्ञान का क्या लाभ है? 
इसीलिए हमे अपने ज्ञान का सही उपयोग करने के लिए ऊर्जा के उस पावर हाउस से जुड़ना पड़ेगा, उसकी ऊर्जा धारण करनी पड़ेगी, और स्वयं को ऊर्जावान बनाना पड़ेगा ताकि हम अपने भाग्य को, जिसे परमात्मा ने हमारे ही हाथ में दिया है, उसे उज्जवल बना सकें। 
धन्यवाद
सपना पांडे 

Comments

  1. U words felt so soothing....thanks for sharing this with us😙

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